राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की रचना को 150 वर्ष पूरे होने पर एकल अभियान के द्वारा गोष्ठी एवं सामूहिक गान का आयोजन सरस्वती शिशु मंदिर खड़गवां में किया गया। कार्यक्रम में मुख्यवक्ता प्रणव चक्रवर्ती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघ चालक कोरिया विभाग, संस्था के प्राचार्य शिवनारायण सिंह, कन्हैयालाल वर्मा एवं अनुभव गुप्ता मंचशीन रहे। संस्था प्राचार्य शिवनारायण सिंह ने एकल अभियान का परिचय कराया।
मुख्य वक्ता प्रणव चक्रवर्ती ने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की रचना की पृष्ठभूमि एवं संपूर्ण भावार्थ को बताया उन्होंने बताया 1870–80 के दशक ब्रिटिश शासकों ने सरकारी समारोहों में गॉड! सेव द क्वीन गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया गया था। अंग्रेजों के इस राष्ट्र विरोधी आदेश से बंकिम चंद्र चटर्जी जो कि उन दिनों में एक सरकारी अधिकारी(डिप्टी कलेक्टर)थे को बहुत ठेस पहुंची और उन्होंने 1875 में इसके विकल्प के तौर पर संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण से एक नए गीत की रचना की और उसका शीर्षक वंदे मातरम् दिया, जिसका अर्थ होता है मातृभूमि की वंदना। शुरुआत में केवल दो पद ही रचे गए थे जो संस्कृत में थे इन दोनों पदों में केवल मातृभूमि की वंदना ही था। 1882 में उन्होंने उपन्यास आनंद मठ लिखा तब मातृभूमि से ओतप्रोत इस गीत को उसमें शामिल किया गया। वंदे मातरम् गीत का शीर्षक आजादी की लड़ाई के कालखंड में असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों के आवाज को अभिव्यक्ति देती है। इस जीत से भारत जागा , और यह गीत जन-जन का गीत बना |
कार्यक्रम का संचालन तथा आभार प्रदर्शन संच प्रमुख प्रताप सिंह ने किया | उक्त कार्यक्रम में कृष्ण वर्मा अनुभव गुप्ता देवंती आंचल व्यास, धनंजय पांडे, एकल विद्यालय के आचार्य एवं दीदी के साथ ग्रामीण उपस्थित रहे |








